फुलवा की बेबसी
अनगिनत दुश्वारियों से
एक दिन वो ऊबकर
मर गई फुलवा बेचारी
खुद कुएं में डूबकर ।
जीना वो भी चाहती थी
क्या करे मजबूर थी
एक ही थी बेबसी बस
क्यूंकि वो मजदूर थी ।
थी खड़ी बेबस सी झुनिया
मुंह में आंचल ठूंसकर
रो रहा चिल्ला के हरिया
बिटिया को देखकर ।
हाय किसकी ये लगी
अपराध किसने ये किया
लूटकर अस्मत को पहले
दर्द किसने ये दिया ?
शोख थी चंचल थी फुलवा
बादल में चमकती चांद थी
कल तलक दिखती थी जैसे
ठीक दिखती आज थी ।
छलक रहा अल्हड़ सा यौवन
मादकता सी छाई थी
सुतवा नाक कपोल गोल से
हिरणी सी आंखे पाई थी ।
केश घुघराले तनिक थे
भौंह सुंदर थी सजी
मुझको तो पहली नजर में
उर्वशी सी वो लगी ।
दलितों के उस मुहल्ले
की तो फुलवा जान थी
थी भले निर्धन तो क्या
झुनिया की तो परान थी ।
लाड़ से पाला था उसको
बस यही संतान थी
था विधाता ने रचा जो
उससे वो अनजान थी ।
पड़ गई इक दिन नजर थी
गांव के जमींदार की
थी कहां अब तक छुपी ये
कामिनी संसार की ।
देखता ही रह गया बस
अनुपम छवि भंडार को
वासना का ज्वार मचला
दुष्ट को मक्कार को ।
एक दिन लेकर वो आया
पायलों की जोड़ियां
जिसने कभी मजदूरी न दी
अब लुटाता कौड़ियां ।
लोभ का जो जाल फेंका
सोचकर फंस जाएगी
पर समझती थी ये फुलवा
पास भी न जाएगी ।
दलितों की बहू बेटियों को
ये समझते जागीर है
जब जहां जैसे भी चाहा
डाला गले जंजीर है ।
बिन मजूरी ये खटाते
बिन चबैना काम लें
जेठ की उस दोपहर में
हल जुताये शाम ले ।
मांग मजदूरी लिया जो
मिलती थी गंदी गालियां
चिरौरी विनती के बदले
मिलती थी बस झिड़कियां ।
कर दिया यदि हील हुज्जत
सनक जाती खोपड़ी
रात होने से ही पहले
फूंक देता झोपड़ी ।
नीच की वो वक्र दृष्टि
जबसे फुलवा पर पड़ी
भागती फिरती थी उस पल
देखती थी जिस घड़ी ।
दांव लालच का चला न
बात बनती थी नहीं
कर लिए तरकीब सारे
चाल चलती थी नहीं।
एक दिन झुनियॉ को लेकर
था गया ससुराल वो
पा गया अवसर निकम्मा
फिर बिछाया जाल को ।
था घना छाया कुहासा
लोग घर में थे सभी
लांघकर छप्पर की टाटी
घर में घुस आया तभी ।।
कौन है बस इतना बोली
और कुछ कह न सकी
मुंह दबा खामोश कर दी
न तनिक हिल डुल सकी ।
कर लिया उसने जो करना
कर न सकी प्रतिरोध वो
रक्त से लथपथ पड़ी थी
कैसे करती विरोध वो ?
तंग करता था हमेशा
खूब देता गालियां
डांटता हरिया को जब तब
सिसकती थी झुनिया ।
इन सब का कारण वहीं थी
फुलवा समझती थी इसे
इसलिए दी जान उसने
मार्ग सूझा था उसे ।।
,✍️ राजन शर्मा
दिल्ली ।
फोटो साभार गूगल
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