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भगवान श्रीराम के पाव धुलकर निषादराज खुश, चरणामृत परिवार को पिलाई- आचार्य प्रहलाद जी महराज

भगवान श्रीराम के पाव धुलकर निषादराज खुश, चरणामृत परिवार को पिलाई- आचार्य प्रहलाद जी महराज

केएमबी खुर्शीद अहमद

अमेठी। श्रीराम संगीतमय कथा के सातवें दिन के प्रसंग में कथा व्यास प्रहलाद जी महाराज द्वारा काशीराम मिश्र पत्नी सावित्री  देवी ग्राम-पूरे मदुआपुर, दरपीपुर गौरीगंज अमेठी बहुत मार्मिक प्रसंग करते हुये राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की शादी के पश्चात सभी अयोध्या वापस आ जाते हैं।पूरे नगर में प्रसन्नता का एक सुन्दर माहौल बना हुआ होता है। राजतिलक की तैयारी चल रही थी तभी मन्थरा के द्वारा कैकेई के कान भरकर कोपभवन भेज दिया जाता है, खुशियों से ओत प्रोत राजा दशरथ को जब पता चलता है कि कैकेई कोपभवन में है तब राजा उन्हें मनाने जाते हैं। बहुत भयावह दृश्य देख राजा दशरथ स्तब्ध रह जाते हैं और कैकेई को मनाने के लिए संवाद करते हैं तब कैकेई तीन वरदान माँगती है। भरत को राजगद्दी, राम को चौदह वर्ष का वनवास वह भी तपस्वी  के भेष में, यह सुनकर राजा बेहोश हो जाते उन्हें राज दरबार वापस लाया जाता है वहाँ शून्यावस्था में राम-राम का जाप कर रहे हैं। जब भगवान राम को यह सूचना मिलती है तो सहर्ष वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। उनके साथ सीता जी और लक्ष्मण भी तैयारी कर लेते हैं अगले ही दिन राम लक्ष्मण सीता जी वन गमन हेतु प्रस्थान करते है और श्रृंगवेरपुर गंगा जी के तट पर पहुँच जाते हैं। वहाँ गंगा जी को पार करने हेतु केवट को बुलाते है। केवट को बहुत वर्षो से इसी दिन का इन्तजार था। आज वह अवसर आ गया है राम जी के अगाध प्रेम का वशीभूत राम जी का पाँव को धुलने के लिए नाटक करता है कि महाराज पाँव धुला ले अन्यथा की स्थिति में आपके पाँव का रजक मेरी नाव को भी स्त्री बना देगा, यही मेरा परिवार  पालने का माध्यम है वह भी समाप्त हो जायेगा मैं क्या करूँगा मेरे पास और कोई हुनर भी नहीं  है। इसलिए हे नाथ यदि आपको पार उतरना हो तो अपना चरण धोने का आदेश दे। इस तरह  केवट को पिछले जन्म की याद आ गयी कि मैं कछुये के रूप में छीरसागर में प्रभू का पाँव छूने का प्रयास कई बार किया लेकिन  शेषनाग की फुँकार से मै डरकर हट जाता था लेकिन अबकी बार ऐसा नहीं होगा बिना पाँव धुले पार नहीं जाने दूँगा। तब राम जी केवट की भावना को समझकर पाँव थुलने का आदेश करते हैं, भगवान का चरण पाकर केवट आनन्दित होता है। उस चरणामृत को स्वयं भी पीता है और अपने परिवार को भी प्रसादी ले जाने के लिये रखकर भगवान को पार ले जाता है। वापस होते समय भगवान के पास देने के लिए कुछ नहीं होता। सीता जी जैसे ही राम के भाव को समझती है वैसे ही अपनी मुद्रिका को उतराई मानकर देने लगती हैं। वह कहते हैं प्रभु आपने सबकुछ तो दे दिया अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। अतिथि सेवार्थी में पवन मिश्र, विष्णु मिश्र, संजीव शर्मा, तीर्थराज, धर्मराज, अवधराज, राजराज, आशीष, सुनील, दीपक मिश्र, बब्बू, सौरभ तिवारी, अंगद, रामसूरत, श्रवण, शिवशंकर तिवारी, बीरेन्द्र  सिंह, सौरभ तिवारी, अनिल शुक्ल हजारो की संख्या में लोगों ने कथा के श्रवण का आनन्द उठाया।
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