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सरकारी आईटीआई में करोड़ों की वित्तीय अनियमितता, शासनादेश की जमकर उड़ाई गई धज्जियां

सरकारी आईटीआई में करोड़ों की वित्तीय अनियमितता, शासनादेश की जमकर उड़ाई गई धज्जियां

केएमबी संवाददाता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में संचालित विभिन्न राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में करोड़ों की वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। शासनादेशों की अनदेखी कर 2 लाख से अधिक मूल्य के मशीन,उपकरण आदि की खरीद सीधे फर्मों से कर ली गई, जबकि शासनादेश संयुक्त सचिव, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जारी शासनादेश संख्या-16आई/868788/2025 दिनांक 01 फरवरी, 2025 और शासनादेश संख्या- 04/आई/860787/2025 दिनांक 24 जनवरी, 2025 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ₹2 लाख तक के उपकरणों की खरीद विकेन्द्रीयकृत व्यवस्था के तहत संबंधित संस्थानों के प्रधानाचार्य द्वारा की जाएगी, जबकि ₹2 लाख से अधिक मूल्य की मशीनों का क्रय केन्द्रीयकृत व्यवस्था के तहत जेम पोर्टल से किया जाना था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विभाग के उच्च अधिकारियों और प्रधानाचार्यों की मिलीभगत से शासनादेश की धज्जियां उड़ाते हुए मेसर्स आर एस टूल्स एवं मेसर्स विवेक एंटरप्राइजेज से डायरेक्ट परचेज के माध्यम से करोड़ों रुपये की खरीद कर ली गई, जो संदेह के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार, मेसर्स यू पी किसान एग्रो एवं मेसर्स श्री आनंद टेक्नोलॉजी को बिड संख्या-GEM 2025/8/5969162 में पहली बार अयोग्य घोषित किया गया, लेकिन दूसरी बार उच्च अधिकारियों एवं प्रधानाचार्य की मिलीभगत से अयोग्य घोषित कर दिया गया, जो जाँच का विषय है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इन सभी फर्मों के प्रोपराइटर विवेक अरोड़ा, उनके सगे संबंधी और उनके कर्मचारियों द्वारा ही संचालित किए जा रहे हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरे प्रकरण में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर मशीनें खरीदी गई है यह साफ इशारा करता है कि पूरा मामला बड़ी वित्तीय धांधली और भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है। उक्त वित्तीय अनियमितता पर शिकायतकर्ता ने माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश से उच्च स्तरीय जांच की मांग की है इस मामले की गंभीरता को देखते हुए निदेशक, प्रशिक्षण एवं सेवायोजन, लखनऊ ने पत्रांक-3739 दिनांक 06 फरवरी, 2025 को प्रमुख सचिव से मार्गदर्शन मांगा था, जबकि पत्रांक-3998 एवं 3999 दिनांक 25 मार्च, 2025 के तहत साज-सज्जा की खरीद को शर्तों के अधीन अनुमति दी गई।अब मांग उठ रही है कि शासनादेश के उल्लंघन, वित्तीय अनियमितता और सरकार की छवि को धूमिल करने वाले इस घोटाले की उच्च स्तरीय जाँच कराई जाए और जब तक जाँच पूरी न हो, तब तक संबंधित विभाग द्वारा राजस्व हित में भुगतान को रोका जाना न्याय संगत होगा । अब देखने वाली बात होगी कि प्रदेश सरकार इस घोटाले पर क्या कदम उठाती है और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होती है या नहीं!
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