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राम जानकी मंदिर में रामकथा का सातवां दिन: भरत-राम मिलन और शबरी भक्ति का भावपूर्ण वर्णन

राम जानकी मंदिर में रामकथा का सातवां दिन: भरत-राम मिलन और शबरी भक्ति का भावपूर्ण वर्णन

केएमबी ब्यूरो मुकुल बरनवाल
मैरवा। स्थानीय श्री राम जानकी मंदिर में चल रहे भव्य रामकथा महोत्सव के सातवें दिन कथा वाचक पंडित कंचन किशोरी जी ने भगवान श्रीराम और भरत जी के मिलन तथा माता शबरी की अद्भुत भक्ति का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
कथा में बताया गया कि अयोध्या नगरी में जब श्रीराम को वनवास हुआ, तब उनके छोटे भाई भरत को यह समाचार अत्यंत दुखद लगा। वे तुरंत वन की ओर श्रीराम को वापस लाने के लिए निकल पड़े। भरत जी का हृदय अपने भाई के प्रति प्रेम और सम्मान से भरा हुआ था। वे नंगे पैर और साधारण वेश में चित्रकूट पहुँचे, जहाँ श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण निवास कर रहे थे।
चित्रकूट में दोनों भाइयों का मिलन अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी रहा। भरत जी ने श्रीराम से अयोध्या लौटकर राज्य संभालने का आग्रह किया, लेकिन श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म बताया। तब भरत जी ने विनम्रता के साथ श्रीराम की खड़ाऊँ माँगी। श्रीराम ने अपनी खड़ाऊँ उन्हें सौंप दी। भरत जी उन खड़ाऊँ को अयोध्या ले आए और सिंहासन पर स्थापित कर स्वयं एक सेवक की भाँति राज्य संचालन करने लगे। यह प्रसंग त्याग, समर्पण और मर्यादा का अनुपम उदाहरण है।
इसके साथ ही कथा में माता शबरी की अटूट भक्ति का भी वर्णन किया गया। बताया गया कि वनवास के दौरान जब श्रीराम शबरी के आश्रम पहुँचे, तो शबरी माता ने अत्यंत प्रेम से उनका स्वागत किया। उन्होंने अपने हाथों से बेर चख-चखकर मीठे फल भगवान को अर्पित किए। भगवान श्रीराम ने बिना किसी भेदभाव के उन बेरों को बड़े प्रेम से स्वीकार किया। कथा के अंत में श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि सच्ची भक्ति में भेदभाव का कोई स्थान नहीं होता, बल्कि प्रेम और समर्पण ही सर्वोपरि है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
इस अवसर पर दयाशंकर प्रसाद, डॉ. दिनेश चंद्र, संदीप तुरहा, राकेश कुमार उर्फ जस्सी, अर्जुन सिंह, मुकुल कुमार बरनवाल एवं चन्दन जायसवाल सहित कई श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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