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ईमान का सफ़र: भीगी पलकों और 'लब्बैक' की सदाओं के बीच रब के घर को चले खुशनसीब, प्राइवेट टूर आपरेटरों का पहला हज जत्था मदीना मुनव्वरा रवाना

ईमान का सफ़र: भीगी पलकों और 'लब्बैक' की सदाओं के बीच रब के घर को चले खुशनसीब, प्राइवेट टूर आपरेटरों का पहला हज जत्था मदीना मुनव्वरा रवाना 

केएमबी संवाददाता
लखनऊ, 28 अप्रैल, 2026। चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा महज़ एक एयरपोर्ट नहीं, बल्कि जज़्बात और अक़ीदत का वह समंदर नज़र आ रहा था जहाँ हर लहर एक दुआ बनकर अर्श की ओर उठ रही थी। हज और उमरा यात्रियों की पहली पसंद सऊदी अरेबिया एयरलाइंस की दो उड़ानों ने आजमीने-हज के मुकद्दस सफर का आगाज़ किया, जिसमें पहली फ्लाइट सुबह और दूसरी फ्लाइट रात को जेद्दा के लिए रवाना हुई। फिज़ाओं में बिछड़ने की कशिश और महबूब के दर पर पहुँचने की बेपनाह खुशी एक साथ घुली हुई थी। आज हज-2026 के उन मुक़द्दस मुसाफ़िरों की रवानगी थी, जिन्हें अल्लाह ने अपने काबे की ज़ियारत के लिए चुना है।
खिदमत का जज़्बा: जब रहबर बने खिदमतगार
अल्लाह के मेहमानों के इस अज़ीम सफ़र को मुकम्मल करने की ज़िम्मेदारी निजी हज टूर ऑपरेटर्स के मोतबर नामों हिना ट्रैवल सर्विस, रियाज़ टूर एंड ट्रैवल और शान एंटरप्राइजेज ने संयुक्त रूप से उठाई। रियाज़ टूर एंड ट्रैवल के सीईओ रियाज़ अहमद और चीफ ऑपरेशन्स (हज व उमरा) उमैर नजम शाह खुद इमाम-ए-काफिला बनकर हवाई अड्डे पर मौजूद रहे। उनकी नम आँखें और मुस्तैदी गवाह थी कि उनके लिए यह महज़ एक कारोबार नहीं, बल्कि आख़िरत की कमाई और खिदमत-ए-ख़ल्क का ज़रिया है।
विदाई का वो मंज़र: जब पत्थर भी पसीज जाए
हवाई अड्डे के टर्मिनल पर मंज़र ऐसा था कि मंज़रकशी करते हुए कलम भी कांप जाए। विदाई की उन आख़िरी घड़ियों में जब एक बूढ़ी माँ ने अपने बेटे के माथे को चूमा और कांपती आवाज़ में कहा, "मेरे हक़ में दुआ करना", तो वहाँ मौजूद हर शख्स की पलकें भीग गईं। कहीं कोई छोटा बच्चा अपने दादा का हाथ थामे रो रहा था, तो कहीं कोई जवान बेटा अपने ज़ईफ़ बाप के हाथ चूमकर ज़ार-ओ-क़तार रोते हुए दुआओं की दरख्वास्त कर रहा था। अपनों से दूर होने की टीस तो थी, लेकिन काबे की चौखट चूमने का वो रूहानी नूर ज़ायरीन के चेहरों पर साफ़ झलक रहा था, जो हर गम पर भारी था।
रियाज़ अहमद की पुरखुलूस दुआ और मुकम्मल तैयारी
इस रुला देने वाली रवानगी के बीच रियाज़ अहमद ने हाथ उठाकर तमाम ज़ायरीन के लिए दुआ की— "ऐ अल्लाह! इन मुसाफ़िरों के सफ़र को आसान कर, इनकी इबादतों को अपनी बारगाह में मक़बूल कर और जब ये तेरे घर के सामने खड़े हों, तो इनकी झोलियाँ मुरादों से भर देना। परवरदिगार! उमैर नजम शाह और मेरी इस नाचीज़ खिदमत को अपनी बारगाह में क़बूल फ़रमाना और सबको 'हज-ए-मबरूर' की सआदत अता करना।"
रियाज़ अहमद ने बताया कि आज़मीने-हज का आख़िरी जत्था 7 मई को रवाना होगा। इस आख़िरी काफिले के साथ वह स्वयं और उनकी टीम के सदस्य भी जाएंगे ताकि मक्का मुकर्रमा की सरज़मीन पर वह खुद अपने हाथों से हाजियों की खिदमत कर सकें। उन्होंने तसल्ली दी कि उनकी एक टीम पहले से ही मक्का मुकर्रमा में मेहमानों की अगवानी के लिए पलकें बिछाए खड़ी है।
जैसे ही ज़ायरीन का काफिला टर्मिनल के अंदर दाखिल हुआ और आख़िरी बार पलटकर अपनों की तरफ देखा, तो 'अल्लाह हाफिज़' की पुकार और सिसकियों ने माहौल को रूहानी सुकून से भर दिया। यह बिछड़ना नहीं था, यह तो उस पाक दर की ओर पहला कदम था जहाँ पहुँचने की हसरत में इंसान उम्र गुज़ार देता है।

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