जलसा शुहदा-ए-इस्लाम के पांचवें इजलास में सहाबा-ए-किराम की अज़मत पर रोशनी
केएमबी ब्यूरो
सुल्तानपुर, 21 जून 2026। जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में जारी दस दिवसीय "जलसा शुहदा-ए-इस्लाम" के पांचवें इजलास का आयोजन जामिया के नाज़िम-ए -आला मौलाना मुहम्मद उस्मान कासमी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं वक्ता मौलाना मुहम्मद आसिफ आज़मी ने सहाबा-ए-किराम के मक़ाम, फज़ीलत और खिलाफत-ए-राशिदा के विषय पर विस्तार से संबोधित किया।
अपने बयान में मौलाना आसिफ आज़मी ने कहा कि नबी-ए-करीम ﷺ के बाद मक़ाम और मर्तबे के लिहाज से हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.), हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.), हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) और हज़रत अली अल-मुर्तज़ा (रज़ि.) का दर्जा क्रमवार सबसे ऊंचा है। उन्होंने कहा कि खुलफ़ा-ए-राशिदीन की वर्तमान तरतीब ही तरतीब-ए-बरहक़ है और यही अहल-ए-सुन्नत का मान्य दृष्टिकोण रहा है।
मौलाना ने अपने संबोधन में कहा कि सहाबा-ए-किराम इस्लाम में हक़ और मार्गदर्शन का पैमाना हैं तथा उनके सम्मान और तक़द्दुस की हिफाज़त हर मुसलमान की जिम्मेदारी है। उन्होंने वाक़िया-ए-ग़दीर-ए-ख़ुम का उल्लेख करते हुए कहा कि उसका संदर्भ और पृष्ठभूमि अलग थी तथा उसे खिलाफत के मसले से जोड़कर देखना सही नहीं है।
कार्यक्रम में मौलाना मुहम्मद मुख़्तार कासमी ने भी सहाबा-ए-किराम की अज़मत और उनके दीन के लिए किए गए योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
जलसे का शुभारंभ जामिया के छात्र मुहम्मद ज़ाहिद की तिलावत-ए-कुरआन से हुआ। इसके बाद अरबी सोम के छात्र मुहम्मद अजमल ने "सीरत-ए-अली" विषय पर प्रभावशाली तकरीर प्रस्तुत की। वहीं मौलाना मुहम्मद अराफात कासमी तथा छात्र मुहम्मद सरफराज ने नात व मनकबत पेश कर माहौल को रूहानी रंग में रंग दिया।
इस अवसर पर शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में उलेमा, तलबा और आम नागरिक मौजूद रहे। कार्यक्रम का समापन मौलाना मुहम्मद आसिफ आज़मी की दुआ के साथ हुआ। जलसा शुहदा-ए-इस्लाम का यह पांचवां इजलास अत्यंत शांतिपूर्ण एवं सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
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