अंग्रेजों के गोली मारने के आदेश के बाद भी नहीं झुके उमाशंकर प्रसाद
केएमबी मुकुल बरनवाल
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका से अंग्रेजी हुकूमत थी परेशान, स्कूल में लगाई आग और किराने की दुकान लूटने के बाद जारी किया था देखते ही गोली मारने का फरमान
महाराजगंज (सीवान)। आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल बड़े शहरों और राष्ट्रीय नेताओं के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि देश के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों के उन वीर सपूतों के त्याग और बलिदान से भी जुड़ा है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। सीवान जिले के महाराजगंज की धरती के ऐसे ही महान स्वतंत्रता सेनानी थे स्वर्गीय उमाशंकर प्रसाद, जिन्हें क्षेत्र में शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण ‘महाराजगंज का मालवीय’ भी कहा जाता है।
उमाशंकर प्रसाद ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के साथ शिक्षा को भी राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया। उपलब्ध स्थानीय स्रोतों के अनुसार, अंग्रेजी शासन ने वर्ष 1942 में उन्हें देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किया था। इसके बाद वे भूमिगत होकर आंदोलन से जुड़े लोगों को आर्थिक सहयोग पहुंचाते रहे।
28 वर्ष की उम्र में स्थापित किया विद्यालय
उमाशंकर प्रसाद की सबसे बड़ी विशेषताओं में एक थी कि उन्होंने शिक्षा को देश और समाज के जागरण का माध्यम बनाया। महज 28 वर्ष की उम्र में वर्ष 1931 में महाराजगंज शहर के बीच अपनी निजी भूमि पर निजी कोष से उमाशंकर प्रसाद हाई स्कूल की स्थापना की। विद्यालय में बच्चों को शिक्षा देने के साथ उनमें राष्ट्रभक्ति और देश की आजादी के प्रति जागरूकता पैदा करने का काम भी किया गया।
उनकी ओर से स्थापित विद्यालय आज भी उनके नाम और शिक्षा के प्रति समर्पण की याद दिलाता है। विद्यालय के अस्तित्व की पुष्टि वर्तमान शैक्षणिक रिकॉर्ड में भी होती है।
गांधी जी को भेंट की थी 1001 रुपये की थैली
महात्मा गांधी के महाराजगंज आगमन के दौरान उमाशंकर प्रसाद ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए आर्थिक सहयोग किया था। स्थानीय पारिवारिक विवरण के अनुसार उन्होंने गांधी जी को 1001 रुपये की थैली भेंट की थी, ताकि आंदोलन आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण कमजोर न पड़े। स्थानीय समाचार रिपोर्ट में भी इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
अंग्रेजों ने स्कूल में लगा दी आग
स्वतंत्रता आंदोलन में उमाशंकर प्रसाद की सक्रियता अंग्रेजी हुकूमत को लगातार परेशान कर रही थी। जब अंग्रेजी अधिकारी उन्हें पकड़ने में सफल नहीं हुए तो उनके संस्थान और प्रतिष्ठान निशाने पर आ गए।
स्थानीय विवरणों के अनुसार, अंग्रेज सैनिकों ने उमाशंकर प्रसाद हाई स्कूल में आग लगा दी। इसके बाद उनकी मुख्य सड़क स्थित किराने की दुकान को भी लूट लिया गया। इतना ही नहीं, अंग्रेजी शासन ने उनके खिलाफ ऐसा फरमान जारी किया कि उन्हें देखते ही गोली मार दी जाए।
लेकिन दमन और धमकियों के बावजूद उमाशंकर प्रसाद का हौसला नहीं टूटा। वे भूमिगत रहकर भी स्वतंत्रता आंदोलन को आर्थिक और सामाजिक स्तर पर मजबूती प्रदान करते रहे।
नमक आंदोलन में राजेंद्र प्रसाद के साथ निभाई भूमिका
उमाशंकर प्रसाद का संबंध केवल स्थानीय गतिविधियों तक सीमित नहीं था। पारिवारिक और स्थानीय विवरणों के अनुसार उन्होंने देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ नमक आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके अलावा असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन समेत कई आंदोलनों में उनकी भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
व्यवसायी परिवार से थे, आंदोलन के लिए लगाया धन
उमाशंकर प्रसाद एक संपन्न व्यवसायी परिवार से आते थे। उन्होंने अपनी आर्थिक क्षमता को निजी सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं रखा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने जरूरत के समय आंदोलनकारियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई।
उनके पौत्र इंजीनियर प्रमोद रंजन के अनुसार, उमाशंकर प्रसाद ने अपनी जमीन का बड़ा हिस्सा स्कूल, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक संस्थानों के लिए उपलब्ध कराया था। आजादी के बाद भी उन्होंने समाज और क्षेत्र के विकास के लिए अपने संसाधनों का इस्तेमाल किया।
दो बार विधानसभा पहुंचे उमाशंकर प्रसाद
देश आजाद होने के बाद जब लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई तो महाराजगंज की जनता ने अपने इस स्वतंत्रता सेनानी को राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी भी सौंपी। उपलब्ध स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, 1962 और 1967 में उमाशंकर प्रसाद महाराजगंज विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
सार्वजनिक जीवन में रहते हुए उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए कई कार्य कराए। सड़क निर्माण से लेकर शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों के विकास में उनका योगदान बताया जाता है। उन्होंने अपने निजी कोष से शांति गांधी उद्यान में महात्मा गांधी की प्रतिमा भी स्थापित कराई थी।
40 वर्षों तक निर्विरोध रहे यूनियन बोर्ड के अध्यक्ष
उमाशंकर प्रसाद का सार्वजनिक जीवन बेहद लंबा रहा। वे लोकल बॉडीज यूनियन बोर्ड के करीब 40 वर्षों तक निर्विरोध अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने महाराजगंज क्षेत्र के विकास और सामाजिक संस्थाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें स्थानीय स्तर पर ‘महाराजगंज का मालवीय’ कहा गया। उन्होंने कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना और निर्माण में सहयोग किया तथा क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने का काम किया।
आजादी की विरासत को संजोने की जरूरत
उमाशंकर प्रसाद का जीवन स्वतंत्रता, शिक्षा, त्याग और समाजसेवा के अद्भुत समन्वय का उदाहरण है। एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत उन्हें गिरफ्तार करने और बाद में देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर रही थी, तो दूसरी तरफ वे शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम की भावना पैदा कर रहे थे।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना महज औपचारिकता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से परिचित कराने की जिम्मेदारी भी है। महाराजगंज के इस महान सपूत की स्मृतियों, उनके द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थानों और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
उमाशंकर प्रसाद का संघर्ष यह संदेश देता है कि अंग्रेजों की बंदूकें भी उस संकल्प को नहीं झुका सकीं, जिसने देश की आजादी को अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया था।
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