जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में 'जलसा शुहदा-ए-इस्लाम' की सातवीं नशिस्त सम्पन्न
केएमबी मोहम्मद अफसर
"सहाबा-ए-कराम नबी और उम्मत के दरमियान एक मज़बूत वास्ता हैं, दीन की हिफ़ाज़त के लिए उनकी अज़मत को समझना ज़रूरी है" — मुफ्ती मुहम्मद सालेह सहारनपुरी
सुल्तानपुर, 24 जून। जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में जारी दस रोज़ा 'जलसा शुहदा-ए-इस्लाम' की सातवीं नशिस्त इल्मी, रूहानी और फ़िक्री माहौल में सम्पन्न हुई। कार्यक्रम की सदारत जामिया के नाज़िम-ए-आला मौलाना मुहम्मद उस्मान क़ासमी ने की, जबकि देश के विभिन्न हिस्सों से आए उलमा-ए-कराम ने शिरकत की।
नशिस्त के मेहमान-ए-ख़ुसूसी एवं जामिया मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के अमीन-ए-आम मुफ्ती मुहम्मद सालेह सहारनपुरी ने अपने ख़िताब में सहाबा-ए-कराम की अज़मत और उम्मत के साथ उनके गहरे ताल्लुक़ पर तफ़्सीली रौशनी डाली। उन्होंने कहा कि सहाबा-ए-कराम नबी-ए-अकरम ﷺ और उम्मत के दरमियान वह मज़बूत कड़ी हैं जिनके ज़रिये क़ुरआन, सुन्नत और दीन की तमाम तालीमात हम तक पहुँची हैं। उन्होंने कहा कि सहाबा की अदालत और अमानत पर शक करना दरअसल दीन की बुनियादों पर सवाल उठाने के बराबर है।
मुशाजरात-ए-सहाबा के मौज़ू पर वज़ाहत करते हुए उन्होंने कहा कि सहाबा-ए-कराम के दरमियान जो इख़्तिलाफ़ात हुए, वे किसी नफ़्सानी ख़्वाहिश का नतीजा नहीं थे बल्कि इज्तिहादी मसाइल में राय के फ़र्क़ की बुनियाद पर थे। उन्होंने हज़रत तल्हा (रज़ि.) की मिसाल पेश करते हुए कहा कि जिन हस्तियों को दुनिया में ही जन्नत की बशारत दी गई हो, उनके बारे में बदगुमानी की कोई गुंजाइश नहीं रहती। उन्होंने कहा कि जंगे सिफ़्फ़ीन के सिलसिले में अहले सुन्नत का मौक़िफ़ यही है कि हज़रत अली (रज़ि.) का इज्तिहाद ज़्यादा दुरुस्त था, लेकिन हज़रत मुआविया (रज़ि.) को गुनहगार नहीं कहा जा सकता।
इसी नशिस्त को ख़िताब करते हुए मुफ्ती अब्दुर रशीद ने कहा कि सहाबा-ए-कराम हिदायत के चमकते सितारे और रोशनी के मीनारे हैं। वे इल्म, अमल, तज़किया और इख़्लास की बुलंद मिसाल थे तथा उनकी फ़ज़ीलत और मक़बूलियत की गवाही स्वयं अल्लाह तआला ने क़ुरआन में दी है।
कार्यक्रम का आग़ाज़ जामिया के उस्ताज़-ए-हिफ्ज़ मौलाना इफ़हामुल्लाह की तिलावत-ए-क़ुरआन से हुआ। इसके बाद दर्जा अरबी चहारुम के छात्र मुहम्मद अहनफ़ तथा क़ारी मुहम्मद नदीम फ़ैज़ी ने नात व मनक़बत पेश कर महफ़िल को रूहानी रंग में रंग दिया। वहीं दर्जा फ़ारसी के छात्र मुहम्मद यासिर इलाहाबादी ने मदह-ए-सहाबा के विषय पर प्रभावशाली तक़रीर प्रस्तुत की।
नशिस्त का समापन दुआ के साथ हुआ। उपस्थित लोगों ने इस प्रकार के इल्मी और इस्लाही कार्यक्रमों को समाज में दीन की सही समझ और उम्मत की राहनुमाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
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