जलसा शोहदा-ए-इस्लाम की छठी नशिस्त संपन्न, सहाबा-ए-किराम की सीरत पर डाली गई रोशनी
सुल्तानपुर, 22 जून 2026। जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में जारी दस दिवसीय ‘जलसा शोहदा-ए-इस्लाम’ की छठी नशिस्त (बैठक) अकीदत और रूहानियत के माहौल में कामयाबी के साथ सम्पन्न हुई। जलसे में उलमा-ए-किराम ने सहाबा-ए-किराम की फज़ीलत, मुहर्रम की अहमियत और इस्लामी अक़ीदों की इस्लाह पर विस्तृत प्रकाश डाला।
मुख्य वक्ता मौलाना मोहम्मद क़सीम क़ासमी ने अपने खिताब में कहा कि “नबी-ए-करीम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तमाम सहाबा रुश्द व हिदायत के आसमान के दरख़्शंदा सितारे हैं और रिसालत के गुलसितां के महकते हुए फूल हैं।” उन्होंने कहा कि मदह-ए-सहाबा और दिफ़ा-ए-सहाबा हर मुसलमान की जिम्मेदारी है तथा सहाबा-ए-किराम की मुहब्बत ईमान का अहम हिस्सा है।
अपने बयान में उन्होंने विशेष रूप से हज़रत ज़ैद बिन हारिसा की ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार हज़रत ज़ैद (रज़ि.) ने नबी-ए-करीम की ख़िदमत को दुनिया की हर चीज़ पर तरजीह दी और वफ़ादारी व मोहब्बत की मिसाल कायम की।
इस अवसर पर मौलाना मुतह्हर-उस-सलाम क़ासमी ने अपने संबोधन में कहा कि शोहदा-ए-इस्लाम के ये जलसे उम्मत के अक़ीदे की इस्लाह और दीन की सही समझ पैदा करने का माध्यम हैं। उन्होंने माहे मुहर्रम की फ़ज़ीलत और उसकी अज़मत पर भी प्रकाश डाला तथा कहा कि इस मुबारक महीने का उल्लेख क़ुरआन मजीद में विशेष महत्व के साथ किया गया है।
कार्यक्रम का आगाज़ मोहम्मद सादान द्वारा क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुआ। इसके बाद दर्जा-ए-हिफ़्ज़ के छात्र मोहम्मद ज़ैद ने मनक़बत पेश कर श्रोताओं को प्रभावित किया। वहीं दर्जा-ए-फ़ारसी के छात्र मोहम्मद इज़आन ने हज़रत मुआविया की सीरत पर प्रभावशाली तक़रीर प्रस्तुत की।
जलसे में सुल्तानपुर शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की।
कार्यक्रम का समापन मौलाना मोहम्मद क़सीम क़ासमी की दुआ के साथ हुआ। जलसे की सदारत कर रहे जामिया इस्लामिया के नाज़िम मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए आगामी चारों इजलासों में भी अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील
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