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जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में ‘जलसा शुहदा-ए-इस्लाम’ का चौथा इजलास सम्पन्न

जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर में ‘जलसा शुहदा-ए-इस्लाम’ का चौथा इजलास सम्पन्न

केएमबी संवाददाता
सुल्तानपुर, 20 जून 2026। जामिया इस्लामिया सुल्तानपुर के परिसर में आयोजित ‘जलसा शुहदा-ए-इस्लाम’ (1448 हिजरी) के चौथे अज़ीमुश्शान इजलास का आयोजन शनिवार रात्रि बाद नमाज़-ए-ईशा किया गया। यह रूहानी व इल्मी मज्लिस रात लगभग 11:30 बजे तक जारी रही, जिसमें सहाबा-ए-किराम की कुर्बानियों तथा अहल-ए-बैत के मुक़ाम और फ़ज़ीलत पर उलमा-ए-किराम ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ दरजा अरबी चहारुम के छात्र मोहम्मद अहनाफ़ (पुत्र मौलाना अब्दुल वहीद क़ासमी) द्वारा तिलावत-ए-क़ुरआन से हुआ। इसके बाद मदरसा रियाज़ुल उलूम गोरेनी के क़ारी रियाज़ साहब तथा जामिया के शोबा-ए-हिफ़्ज़ के छात्र मोहम्मद ज़ाहिद ने नात व मनक़बत पेश कर उपस्थित लोगों के दिलों में नबी-ए-करीम ﷺ और उनके असहाब की मुहब्बत को ताज़ा कर दिया।
मुख्य वक्ता मदरसा अरबिया रियाज़ुल उलूम गोरेनी के हज़रत मौलाना अहमद शमीम साहब ने हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) की सीरत और शहादत पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह हज़रत उस्मान (रज़ि.) की अद्वितीय फ़ज़ीलत है कि उन्हें रसूलुल्लाह ﷺ की दो साहबज़ादियों से क्रमशः निकाह का सम्मान प्राप्त हुआ। अपने बयान में उन्होंने हज़रत उस्मान (रज़ि.) की कुर्बानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस कुएँ को उन्होंने यहूदी से ख़रीदकर मुसलमानों के लिए वक़्फ़ कर दिया था, शहादत से पूर्व लगभग 40 दिनों तक उसी कुएँ का पानी उन्हें नसीब नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि कर्बला में तीन दिन पानी बंद होने की घटना को लोग याद रखते हैं, लेकिन हज़रत उस्मान (रज़ि.) की इस कठिन परीक्षा को भी याद रखना चाहिए।
मौलाना अहमद शमीम साहब ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) पर लगाए गए विभिन्न आरोपों का दलीलों के साथ खंडन करते हुए कहा कि यह सब उन तत्वों की साज़िश थी जो मुसलमान होने का दावा करते थे, लेकिन इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे। उन्होंने अत्यंत भावुक अंदाज़ में उस घटना का भी वर्णन किया जब हज़रत उस्मान (रज़ि.) को क़ुरआन की तिलावत करते हुए शहीद कर दिया गया।
इस अवसर पर जनाब मुफ़्ती मोहम्मद उल्लाह साहब ने “अहल-ए-बैत कौन हैं?” विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि अहल-ए-बैत में औलाद-ए-नबी के साथ-साथ अज़वाज-ए-मुतह्हरात भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अहल-ए-बैत की सही पहचान और उनके बारे में सही जानकारी देना ऐसे आयोजनों का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जामिया के नाज़िम-ए-आला हज़रत मौलाना मोहम्मद उस्मान क़ासमी साहब ने की। इस दौरान जामिया के दरजा अरबी सोम के छात्र मोहम्मद हुसैन सुल्तानपुरी ने भी हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) की सीरत पर प्रभावशाली तक़रीर प्रस्तुत की। अंत में मौलाना अहमद शमीम साहब की भावपूर्ण दुआ के साथ इजलास का समापन हुआ। दुआ की गई कि अल्लाह तआला इन मुबारक मज्लिसों, उनके आयोजकों और प्रतिभागियों को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमाए तथा उम्मत-ए-मुस्लिमा को सहाबा-ए-किराम और अहल-ए-बैत की सच्ची मुहब्बत और उनके नक्शे-कदम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

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