शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का विकास है- डॉ संतोष कुमार सिंह (अंश)
लुंबिनी,नेपाल। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, पर्यावरण और समाज के विविध आयामों पर केंद्रित लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार-2026 में भारत और नेपाल के 35 से अधिक विद्वान, शोधार्थी एवं शिक्षाविद अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे। छह प्रमुख विषयगत सत्रों में आयोजित होने वाले इस सेमिनार में बौद्ध दर्शन, डिजिटल शिक्षा, सतत विकास, पर्यावरणीय चिंतन तथा मूल्य आधारित नागरिकता जैसे समकालीन विषयों पर व्यापक अकादमिक विमर्श होगा। सेमिनार के प्रथम सत्र “बौद्ध दर्शन एवं पूर्वी ज्ञान परंपराएं” में तनाव प्रबंधन, नैतिक नेतृत्व, सामाजिक उत्तरदायी निवेश तथा सतत विकास लक्ष्यों में बौद्ध दृष्टिकोण जैसे विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। वहीं “डिजिटल युग में उच्च शिक्षा की पुनर्कल्पना” विषय के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुभवात्मक शिक्षा, जीवन कौशल और भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श होगा।
“साहित्य :सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का उत्प्रेरक” विषय में साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के अंतर्संबंधों की समीक्षा की जाएगी। इसके अतिरिक्त
“इकोफेमिनिज्म, क्लाइमेट फिक्शन एवं पर्यावरणीय मानविकी” सत्र में जलवायु परिवर्तन, हिमालयी क्षेत्रों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और पर्यावरणीय संकटों पर गंभीर चर्चा होगी। “समाज, संस्कृति और सतत विकास” विषय के अंतर्गत भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, लोक परंपराओं और मानव सभ्यता के विकास में शिक्षा की भूमिका पर शोध प्रस्तुत होंगे। वहीं “मूल्य आधारित शिक्षा एवं नैतिक नागरिकता” सत्र में युवाओं में नैतिकता, सामाजिक समरसता, उत्तरदायी नागरिकता और मानवीय मूल्यों के संवर्धन पर विमर्श किया जाएगा। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जनपद से प्रतिभागी शिक्षाविद डॉ. संतोष कुमार सिंह 'अंश' ने अपने उद्बोधन में कहा कि- "आज का समय केवल तकनीकी प्रगति का नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण का भी समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति ने शिक्षा के स्वरूप को बदल दिया है, किंतु शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदनाओं का विकास है। बौद्ध दर्शन हमें करुणा, सह-अस्तित्व और मध्यम मार्ग की शिक्षा देता है, जो वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के समाधान का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। उन्होंने आगे कहा कि "भारतीय एवं नेपाली सांस्कृतिक विरासत केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि सतत विकास और विश्व कल्याण की दिशा में मार्गदर्शक विचारधारा है। शिक्षा को यदि संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक चेतना से जोड़ा जाए तो वह राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है। ऐसे अंतरराष्ट्रीय सेमिनार ज्ञान के वैश्विक आदान-प्रदान, शोध की गुणवत्ता और युवा पीढ़ी में मूल्य आधारित दृष्टिकोण विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डॉ. अंश ने लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षा, संस्कृति और समाज के समकालीन प्रश्नों पर आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय विमर्श को भारत-नेपाल के शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। सेमिनार में शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले प्रमुख विद्वानों में डॉ. दीपक आचार्य, डॉ. मलय कुमार भोज, डॉ शिल्पी सिंह, डॉ. धीरज कुमार पांडेय, डॉ. प्रफुल्ल चंद, डॉ. तरुण कुमार शर्मा, डॉ. दीपक कुमार गुप्ता, डॉ. देवाकर सिंह, डॉ. वेद प्रकाश वेदी, डॉ. जितेंद्र कुमार, प्रो. सूरज प्रकाश गुप्ता, प्रो. अभय कुमार लाल, प्रो. सुनील कुमार, माया कुमारी, प्रिया शर्मा, निकिता मणि त्रिपाठी, संग्राम सिंह, रचना, अनन्या शुक्ला, शशिकला चौहान, गिरीश कुमार, तेज बहादुर, रश्मि, जसमीत कौर, मनीष कुमार, कमल थापा, गजेंद्र गुप्ता, कबीर शाक्य, नेशन श्रेष्ठ, दया राम भंडारी, लीलामणि पांडेय, युवराज रायमाझी, देवेंद्र कुमार पाठक, निगाम मौर्य सहित अनेक शोधार्थी एवं शिक्षाविद शामिल होंगे। शिक्षाविदों का मानना है कि यह सेमिनार केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक विकास से जुड़ी नीतियों एवं नवाचारों को नई दिशा प्रदान करेगा। लुंबिनी में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन वैश्विक बौद्ध अध्ययन, मूल्य आधारित शिक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में सार्थक संवाद का महत्वपूर्ण मंच सिद्ध होगा।
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